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उसे सब दुनियां पसंद थी

हम भी और उसे ये सब दुनियां पसंद थी ।
मैं सादा था बहुत उसे रंगीनियां पसंद थी ।

मैं हमेशा दूर भागता रहता फ़रेबों से
और उसे बहुत नज़दीकीयां पसंद थी ।

मैं पुराने “काफ़िर” को ही संजोता रहा
और उसे इसमें तबदिलीयां पसंद थी ।

उसकी चाह रिश्ते के धागे को मिटाना था
और मुझे वही सब निशानियां पसंद थी ।

ये जो सीतम ढ़ाए जा रहे थे ख़ुदग़र्ज़ लोग
उन्हें फ़क़त “काफ़िर” की बर्बादीयां पसंद थी ।

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी
सर्वाधिकार सुरक्षित ®

तुम्हारे बाद ना कहीं के हुए

तुम्हारे बाद ना कहीं के हुए ।
ना आसमां के ना ज़मीं के हुए ।

मुल्क़ छोड़ने से पराये हो गये ?
जहां जन्में थे हम वहीं के हुए ।

जलते रहे आतशे इश्क़ में तो भी
बिछड़ के उसी मह-जबीं के हुए ।

जिसने भी चाहा दिल तोड़ा, तो
क्या ये मामले कुछ ग़मी के हुए !

वो आया भी तो क़ब्र पर मिरे फ़िर
हम मौत के ना ज़िंदगी के हुए ।

ताउम्र रहे रहबरी को मगर इक
व‌क़्त बाद हम ना हमीं के हुए ।

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी
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ज़िंदगी की मार को यूं ही देखते रहे

ज़िंदगी की मार को यूं ही देखते रहे
पानी भी ना मिला ख़ूं भी थूकते रहे

वो वादा किया था इक शब मिलने का
न आया महजमाल, ताउम्र देखते रहे

जिनकी हिफ़ाज़त में हर क़तरा बहा’
वहीं लोग हमें हमेशा ही परखते रहे

वो मिट्टी जिनमें बहोत नमी आ गई
बहुत से घर टूटे बहुत से दरकते रहे

दिल में ग़मों के दरख़्त कुछ यूं हिले
कुछ शांत हो गए कुछ बिलखते रहे

इक शब यूं हुआ, आंसू आए औ फ़िर
कुछ बह गये और कुछ छलकते रहे

इक इंसां कुछ ऐसे मरा कि “काफ़िर”
सब देख रहे थे सो हम भी देखते रहे

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

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एक विचार

जल्दबाज़ी में कोई रचना और रिश्तों को कभी नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से “अर्थ का अनर्थ” हो जाता है |

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी
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तू क्या सोचता है तुझे तन्हाई ना मिलेगी

तू क्या सोचता है ? तुझे तन्हाई ना मिलेगी,
आंखें रोएंगी औ’ आंसुओं को रिहाई ना मिलेगी !

ये सोचकर कि अच्छा था सफ़र जितना भी था
छोड़ देते हैं कि ऐसी दस्ताने रानाई ना मिलेगी ।

मिल जाएं भले ही और, ज़्यादा- चाहने वालें
मगर हमारे जैसा उनपे ‘फ़िदाई’ ना मिलेगी ।

भले ही वो बिछड़ा हो कितनों से मगर “काफ़िर”
हम बिछड़े भी तो हमारी तरह जुदाई ना मिलेगी ।

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी
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मिलो तो जीत ना मिलो तो हार ख़ुद को

मिलो तो जीत ना मिलो तो हार ख़ुद को
मैं कोई आइना नहीं जो देख संवार ख़ुद को

सहर एक यूं ही ढूंढते रहे यादों की दरख़्त पे
पर इस तरह ना पाए हम लाचार, ख़ुद को

वो झुमका,बिंदी,वो काजल,वो पायल, इनके
साथ नाम दो या,कहो क़यामते क़हर, ख़ुद को

उसकी यादें आती हैं अब उसके बिना ही,
शामें, मनाते हुए जाती है गुज़र, ख़ुद को

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी
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वक़्त की फ़रियाद

कुछ लम्हें चुरा के लाया हूँ तुम्हारे लिए,
जो समय हो कभी‌…आ जाना।
इनमें बेचैनी नहीं है, ग़म भी नहीं है, किसी के
टूटने का डर भी नहीं है…
ना प्यास है, ना किसी चीज़ की तलाश है,
ना आशा है, ना निराशा है, ना बंधन है कोई।
अगर कुछ है तो ‘वो’, उसके ख़ाब,
उसकी हंसी, उसकी बातें,
तो “काफ़िर”, तुम ऐसा करो कि चले आया करो…
हमेशा तुम्हारे लिए, फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत में रहता हूं मैं।

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

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बारिश की बूँदें, वो और मैं

बूँदें और वो

ये बूँदें कितना कुछ जानतें हैं ना
उनके बारे में और कितना
कुछ समेटे रहते हैं अपने अंदर…
इन्हीं बूँदों में छिपा रहता है,
उनका आना, उनका चहकना, मचलना ।
ये बारिश की बूँदें उनके
बालों को गीला करते हुए
आते हैं नीचे की ओर,
उनके गुलाबी अधरों पर
आ कर ठहर जाते हैं, फिर
यही बूँदें उन अधरों का स्पर्श पाकर
मानो चहकने लगते हैं,
चमकने लगते हैं…
यहां से होते हुए उनके,
सुराहीदार गर्दन पर
नाचते बलखाते पहुंच जाते हैं
दिल के पास,
ये महसूस कराने कि
तुम भी महसूस करो
‘अपने पीया के मिलन को’,
ये महसूस करा कर,वो
पेट सी सपाट भूमि को
भिगोते हुए, उतरने लगते हैं
‘उनके रूह में’, अचानक वो
तड़पने लगते हैं, अपने
पीया के मिलन को,
मिलकर उनकी ख़ुशबू को
अपने मन मस्तिष्क में समेटने को,
एक अजीब सी ख़ुमारी चढ़ने लगती है ।
ये वही बूँदें हैं जिनमें याद आता है
उनका आना और इन्हीं की तरह चले जाना,
ये वही बूँदें हैं जो समेटे हुए हैं
किसी का मिलना और बिछड़ जाना ।

बूंदें और मैं

मेरी अकसर झड़प हो जाती है इनसे
कि क्यों आती हैं हमेशा बारिश में ही?
उनकी यादों की तरह, ख़्वाबों की तरह
क्यों नहीं चली आती हैं, कभी भी ।
फिर ये भी खीझ कर कहते हैं मुझसे
कि “क्यों चले आएं कभी भी कहीं भी?
हमें नहीं भाता यूं बारिश से बिछड़ना,
हमें भी इश्क़ है बेपनाह इन बारिशों से,
जैसे- ‘तुम्हें है उनसे’, जब हमारा(बूँदें) दिल
बहुत टूट जाता है, ग़म छिपाए नहीं छिपते,
समेटे नहीं सिमटते,‌तो चले आते हैं
बिन बारिश (मौसम) के भी, जैसे तुम
निकल जाते हो दूर-कहीं, अपनी
ही सोच के साथ विचरण करने,
किसी बिछड़े हुए मीत की तलाश में ”
और फिर, मैं निरुत्तर हो जाता हूं,
उनके(बूँदों) इस जबाव से…!
मैं उनसे (बूँदों) झुठ कैसे बोल सकता हूं !
कि नहीं, “नहीं है मुझे किसी से इश्क़,
नहीं है मुझे बिछड़े मीत का इंतज़ार”,
आख़िर ये बूँदें, ये बारिश और ‘वो’,
ही तो एक गवाह हैं, ‘मेरे इश्क़ का’…!
मेरी सोच का, मेरी याद का, मेरे ख़्वाब का
मैं इकलौता हक़दार तो नहीं,
इनमें सहभागिता रहती है मेरे दिल की,
मेरे दिमाग़ की, मेरे रूह की…!
कभी-कभी मैं इन बूँदों को
महसूस करने निकल पड़ता हूं,
उनकी यादों के साथ,
उनके ख़्वाबों के साथ, उनकेे
ख़्यालों के साथ, ये और बात कि
‘वो’ ये नहीं होते… और भिगोने लगता हूं
अपने रूह को, जैसे – वो ही
स्पर्श कर रहे हों मेरा रोम-रोम ,
महसूस करने लगता हूं
उनकी यादें, उनकी बातें, मुलाकातें
और यूं ही आंखें बंद किए हुए
उनके ख़्यालों में ग़ुम,
दूर किसी क्षितिज पर
मिल रहे होते हैं,
हमरी और इन बूँदों की रूहें,
जैसे एक दुसरे को बिछड़ने का
दिलाशा दे रहे हों, फ़िर यूं ही
अचानक, बूँदें बंद हो जाती हैं
जैसे हिदायत दे रही हों कि ‘बस करो’,
‘ज़्यादा भिगोगे ठंड लग जाएगी’,
तब ख़्याल आता है कि
‘एक पहर’ यूं ही बीत गए,
जैसे कुछ क्षण हों,….
और फ़िर, विदा लेते हैं
” फ़िर मिलेेंगे, दु:खों के
सैलाबों की चरम पर ” कहते हुए ।।

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

छाया श्रेय:- नितेश मौर्य

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तोड़ने लायक

पास और क्या था कि तोड़ता “काफ़िर”
दिल के सिवा कुछ तोड़ने लायक नहीं था

मेरी जिंदगी के पन्ने इतने मुड़े हुए थे,कि
इसमें अब कुछ मोड़ने लायक़ नहीं था

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी
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मुस्कान कभी खोने मत देना

क्या तुमने, ख़ुद को ध्यान से देखा है आईने में कभी? नहीं ना, देखना भी मत, नज़र लग जाएगी तुम्हारी ही, खास कर ‘वो लाल साड़ी में’ बहुत ही प्यारी लगती हो ।
मैं जब भी तुम्हें देखता हूं उसमें (लाल साड़ी) ठहर जाती है मेरी आंखें, तुम्हारे अलावा कुछ दिखता ही नहीं, जैसे इन आंखों की हद, अब बस तुम तक ही है।
और पता है! मैं ख़ुद रोज़ अपनी नज़रों की नज़र उतार लेता हूं कि कहीं, तुम्हें मेरी ही नज़र ना लग जाए ।।
वो ‘नीली ड्रेस’ वाली फ़ोटो–जिसमें तुम हल्का काजल लगा,
खिंच रही थी…उसी समय मैं बिच में आ गया था,‌ फ़िर तुमने शरमा कर, मुस्कराते हुए अपनी नज़र दुसरी तरफ़ कर लिया था… वो फोटो आज भी रखी है मैंने संभाल कर, कि फ़िर कभी हमारा मिलना हो तो दिखाऊं तुम्हें – वो पुरानी यादें, जिसमें तुम बहुत खुश हुआ करती थी ।।
ये मानना‌ पड़ेगा कि तुम्हारी आंखें आज भी उतनी ही गहरी हैं जितनी हुआ करती थीं, जिनमें मैंने तैरना सीखा था और तुम हर बार मुझे डुबने से बचा लिया करती थी।
और हां, तुम्हारी हल्की लाली लिए होठों कि मुस्कान, जिसपे हर राजा अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे, कभी खोने मत देना।।

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

सर्वाधिकार सुरक्षित

एक और ख़त तुम्हारे नाम

आज भी बहुत थक हार कर तुम्हें ख़त लिखने बैठा हूं,ये जानते हुए भी कि ये तुम्हारे पास नहीं पहुंच पाएंगे, पहुंचेंगे भी कैसे? तुम्हारा पता जो नहीं मालूम…और मालूम भी है तो शायद ख़तें वहां नहीं जाती, जहां तुम अब रहती हो। हा…हा… छोड़ो, मैं भी पता नहीं क्या क्या कहता रहता हूं।
अच्छा सुनो, आजकल तुम्हारी यादें, पता नहीं क्यों पर बहुत तंग करतीं हैं मुझे। बेचैनी सी रहती है हर वक़्त… धड़कनें, बात-बात पर ख़फ़ा हो जाती हैं, तेज़ चलने लगती हैं और सांसें उनका क्रम ताल नहीं मिला पाती नतीजा, रक्त चाप उच्च हो जाता है। कुछ उपाय है क्या इसका?
हां, शायद लोग मुझे पागल समझने लगे हैं कि आज मोबाइल के ज़माने में, मैं तुम्हें ख़त लिखा करता हूं, पर शायद, उन लोगों को नहीं मालूम कि ‘ख़त’ में कितना प्यार, अपनापन और कितना मज़बूत बंधन छुपा होता है। अरे! नहीं नहीं… तुम बुरा मत मानना, वो आजकल के लोग हैं उन्हें नहीं पता ‘ख़त का महत्व’।
हां, आजकल रिश्तों को शायद! मैं अपनी तरफ़ से ज़्यादा कस के रखता हूं जो किसी को पसंद नहीं आता। इसलिए अब मैं सोचता हूं कि रिश्तों को भी अपने अनुसार ढ़लने का, सांस लेने का, अवसर दिया जाए। और तुमने सही कहा था कि “रिश्तों को,अपने हिसाब से चलने दो… ख़ुद चलाने की कोशिश ना करो, टूट जाते हैं या उपेक्षा ही मिलती है”– ये सच हो रहा है।
मैं आज भी चाँद को नहीं उसके बगल में उगे तारे को देखता हूं.. जब, दिल- खाली, आंखें- ख़ामोश, लब आपस में जुड़े हुए और शब्द ख़ुद में क़ैद रहते हैं। मुझे चाँद आज भी खूबसूरत नहीं लगता और क्यों? ये तुम्हें पता है कि उसमें तुम्हारा चेहरा- जो नहीं, तुम्हारी बातें- जो नहीं, तुम्हारी सांसें- जो नहीं।
तुम्हारा “काफ़िर”

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

सर्वाधिकार सुरक्षित ®

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